अच्छा चित्रकार वहीं है, जिसकी वैचारिक तैयारी अच्छी हो : प्रतिमा सिंह

चित्रकार 

प्रतिमा सिंह 

से कला के बारे में चर्चा


प्रश्न: आपकी दृष्टि में एक अच्छा चित्रकार कौन है?

उत्तर:  मेरी दृष्टि में अच्छा चित्रकार वो है जो चित्र बनाने से पहले वैचारिक तैयारी करता हो। चित्र बनाने से पहले उसमें चिंतक, चित्रकार, मूर्तिकार, पुरातत्ववेत्ता सभी की शक्ति जमा हो जाती हो और फिर वह चित्र बनाता हो।

प्रश्न: चित्र को आप क्या मानती हैं? इसको कैसे परिभाषित करेंगी?

उत्तर:  दरअसल चित्र बनता नहीं, वह तो पहले से ही उस स्पेस में विद्यमान होता है। चित्रकार उसको सिर्फ रूप देता है। चित्र, स्पेस से रूप की विरह का नाम है।

प्रश्न: आपका इस फील्ड में आना कैसे हुआ?

उत्तर:  मैंने विज्ञान में परास्नातक साइंस में किया है। मेरे पिता साइंटिस्ट और मां लिटरेचर बैकग्राउंड से थीं। मेरी आर्ट और साइंस दोनों बहुत अच्छी थी। शादी के बाद एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब भी की। कुछ दिनों बाद उसे छोड़ दिया। घर को वक्त देने के साथ-साथ मैं अपने आर्ट पर ध्यान देने लगी। मैंने भगवान गणेश की 100 से ऊपर पेंटिंग्स बहुत से मीडियम से बनाईं। निरन्तर अभ्यास से मेरा सेल्फ कॉन्फिडेंस बढ़ा। मेरे पति जम्मू में पोस्टेड रहे तो वहां पर अधिक रहना हुआ। वहां फाइन आर्ट कॉलेज में स्टडी करती। काफी कुछ घर पर करती। वहां बहुत से वरिष्ठ चित्रकारों के सम्पर्क से बहुत कुछ सीखा। कला के क्षेत्र में जम्मू स्टेट अवार्डी आर्टिस्ट त्रिलोक कौल सर, वीएस राही सर से बहुत कुछ सीखा। लखनऊ में वरिष्ठ चित्रकार और आर्ट हिस्टोरियन अखिलेश निगम सर मेरे मार्गदर्शक हैं।

प्रश्न: एक चित्रकार के रूप में पहचान कब मिली?

उत्तर:  जम्मू में एक फोक आर्ट कैम्प मेरी यात्रा का महत्वपूर्ण मोड़ था। जम्मू प्रवास के दौरान मुझे वह दिशा मिली जो मैं चाहती दिल्ली और मुंबई के कलाकारों को अपर्च्युनिटी, अवेयरनेस, इन्फ्रास्ट्रक्टर, गैलरी, गवर्नमेंट स्कीम्स, पब्लिक सपोर्ट आदि ज्यादा मिलता है। लखनऊ में यह कम कम है। इसलिए लखनऊ के कलाकारों में काबिलियत होने के वावजूद उन्हें अच्छे अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।

प्रश्न: दिल्ली-मुंबई के मुकाबले लखनऊ में पेंटिंग करने वालों के सामने क्या-क्या दिक्कतें रहती हैं?

उत्तर: दिल्ली और मुंबई के कलाकारों को अपच्र्युनिटी, अवेयरनेस, इन्फ्रास्ट्रक्चर, गैलरी, गवर्नमेंट स्कीम्स, पब्लिक सपोर्ट आदि ज्यादा मिलता है। लखनऊ में यह कम कम है। इसलिए लखनऊ के कलाकारों में काबिलियत होने के वावजूद उन्हें अच्छे अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।

प्रश्न: अपनी किसी पेंटिंग-एक्जिबिशन की कोई ऐसी बात या घटना बताएं, जो आपको कभी न भूलती हो।

उत्तर:  जब भी दिल्ली जाने का मौका मिलता एक बार ललित कला की गैलरी में जरूर जाती हूं। मेरा सपना था कि मेरी भी पेंटिंग की एक्जीविशन यहां लगे। मेरा सपना तब पूरा हुआ जब 2017 में वो दिन आ गया कि उसी कला दीर्घा में मेरी एकल प्रदर्शनी हुई। इस बात से मैंने यही जाना कि ऊंचे सपने जरूर देखने चाहिए। जब आप बड़े सपने देखेंगे, तो उसको पूरा करने के लिए प्रयास भी करेंगे और अगर आप निरंतर लगे रहे तो वह एक दिन पूरा जरूर होगा।

प्रश्न: चित्रकारिता की फील्ड में नए आने वालों को क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर:  आजकल के युवा कलाकारों को देखने के लिए गैलरी है, म्यूजियम हैं। अब  उनको तय करना है क्या देखना है और क्या नहीं। सभी कुछ देखना भी ठीक नहीं है। और सभी को अनदेखा करना भी गलत है। दोनों में सामंजस्य बैठाना होगा। इस तालमेल से ही बाहर और भीतर का सामंजस्य बनेगा। युवा चित्रकार के लिए ये जरूरी है  कि वह अपनी चित्र परंपरा को जाने और समझे। दोनों को देखते हुए चलना होगा कि क्या-क्या किया जा चुका है एवं आगे क्या करने की संभावनाएं बाकी हैं।


अखिलेश 'मयंक' के संपादन में लखनऊ से प्रकाशित 

"संदेश वाहक" 

हिन्दी दैनिक, अंक - 01 मई, 2022 से साभार।

Comments

  1. बहुत सुंदर यात्रा और विचार ,शुभकामनाएं

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  2. आपने ने सच में साबित कर दिया है की हर मंजिल मुमकिन हैं बसर्ते रास्ता सही और हौंसले बुलंद हो 💐💐 बहुत बहुत बधाई हो Madam आपको l

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  3. आपने ने सच में साबित कर दिया है की हर मंजिल मुमकिन हैं बसर्ते रास्ता सही और हौंसले बुलंद हो 💐💐 बहुत बहुत बधाई हो Madam 👏🙏 l राकेश चौधरी

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  4. बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं प्रतिमा जी
    प्रेरणास्पद पोस्ट आदरणीय बहुत बहुत आभार 👌👌🙂🙂🙏🙏💐💐

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  5. चित्रकला, कलादीर्घा एवं संग्रहालय जो समाज की सेवा और विकास तथा जनसामान्य के लिए प्रेरणास्पद है। मानव और पर्यावरण की विरासतों के संरक्षण के लिए उनका संग्रह, शोध, प्रचार अथवा प्रदर्शन का उपयोग शिक्षा, अध्ययन और मनोरंजन के लिए होता है।

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