महिला चित्रकारों की सृजनात्मक चित्र अभिव्यक्ति का सृजन : संदीप सुमहेन्द्र
महिला दिवस के अवसर पर जवाहर कला केन्द्र द्वारा "वसुधा" महिला चित्रकार शिविर 8 मार्च से अलंकार कला दीर्घा में शुभारंभ हुआ।
इस शिविर में सभी आमंत्रित चित्रकार महिलाएं प्रातः 10 से सांय 5 बजे अपना चित्रण कार्य करेंगी तथा इस अवसर पर रचनात्मक संवाद और महिलाओं के सशक्तिकरण को समर्पित किया गया है।
शिविर का उद्घाटन जवाहर कला केन्द्र की अतिरिक्त महानिदेशक, अनुराधा गोगिया, द्वारा किया गया। मुख्य अतिथि के रूप में जयपुर नगर निगम की महापौर सौम्या गुर्जर के साथ कई वरिष्ठ, युवा एवं विद्यार्थी चित्रकारों के साथ कई गणमान्य लोग भी उपस्थित रहे। जिनमें शैल चोयल, अंकित पटेल, हेमंत द्विवेदी, अशोक आत्रे, महावीर भारती, सुनीत घड़ियाल, हरशिव शर्मा, डॉ. चंद्रशेखर सैन और अमित हरित ने विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।
इस कला शिविर को निखत अंसारी क्यूरेटर कर रही है, जो स्वयं भी समकालीन कला की प्रमुख क्यूरेटर हैं। इन्होंने अनेक कला प्रदर्शनियों, आर्ट कैंप, कार्यशालाओं और कला वार्ताओं का सफल आयोजन किया है। “वसुधा” के माध्यम से उनका उद्देश्य महिला कलाकारों के लिए ऐसा मंच तैयार करना है, जहाँ वे अपने विचार साझा करती हुई, नई तकनीकों के साथ प्रयोग कर सकेंगी और अपनी विशिष्ट कलात्मक अभिव्यक्ति प्रस्तुत कर सकेंगी।
इस शिविर में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से दस महिला कलाकार भाग ले रही हैं, जो कला की तीन पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
वरिष्ठ और प्रख्यात चित्रकारों में सुरजीत कौर चोयल, मीनाक्षी कासलीवाल भारती और केतकी रॉय चौधरी। मध्य पीढ़ी की चित्रकारों में: शकुंतला महावर, नीलू कांवरिया, हेमल कांकरवाल और करुणा सिंह राजपूत है, तथा युवा उभरती चित्रकारों में हैं: डिम्पल दलाल, एकता शर्मा और जयश्री सिंह देव को आमंत्रित किया गया है। इस शिविर में भाग लेने वाली चित्रकार शांतिनिकेतन, झारखंड, महाराष्ट्र, उदयपुर और जयपुर जैसे विभिन्न क्षेत्रों से आमंत्रित की गई हैं, जिससे यह शिविर विविध सांस्कृतिक और कलात्मक पृष्ठभूमियों का एक जीवंत संगम बन गया है। शिविर के दौरान आगंतुक कलाकारों एवं कला प्रेमियों को एक्रेलिक ऑन कैनवास, धागा कार्य, लोक कला परंपराएँ और समकालीन दृश्य कला जैसी विभिन्न माध्यमों और शैलियों में काम करते हुए देख सकेंगे। यह विविधता भारत में महिला कला के विकसित होते परिदृश्य को सार्थक रूप से दर्शाती है।
“वसुधा – महिला कलाकार शिविर” केवल कला का उत्सव ही नहीं है, बल्कि कला के माध्यम से महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल भी है। विभिन्न पीढ़ियों और क्षेत्रों की कलाकारों को एक मंच पर लाकर यह पहल महिलाओं को अपने अनुभव साझा करने, विचार व्यक्त करने और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करने का अवसर प्रदान करती है।
इस पहल के माध्यम से जवाहर कला केंद्र का उद्देश्य रचनात्मक सहयोग को बढ़ावा देना, विभिन्न पीढ़ियों के बीच मार्गदर्शन की परंपरा को मजबूत करना और महिला कलाकारों को अधिक दृश्यता प्रदान करना है। यह पहल इस संदेश को भी मजबूत करती है कि कला सामाजिक अभिव्यक्ति और सशक्तिकरण का एक प्रभावशाली माध्यम हो सकती है।
उद्घाटन कार्यक्रम में चित्रकारों एवं कलाप्रेमियों से बात करते हुए वरिष्ठ चित्रकार शैल चोयल ने कहा कि महिला कलाकारों के इस कला शिविर के लिए जवाहर कला केन्द्र के आयोजकों को बहुत बहुत बधाई देते हुए हर्ष है, कि जवाहर कला केन्द्र ने महिला कलाकारों की सृजनात्मकता की महत्ता को भी सम्मानित किया है।
एक समय था, यदि मैं अपने पुराने दिनों की याद करूँ तो उदयपुर में एक या दो महिला कलाकार कार्यरत थीं और जयपुर में भी ऐसा ही कुछ था। बाकी जोधपुर, कोटा, आदि में भी लगभग यही हाल था।
राजस्थान भर में स्नातकोत्तर स्तर पर कला शिक्षा शुरू होने क पश्चात् और साथ ही राज्य ललित कला अकादमी के शुभारम्भ के पश्चात् कला गतिविधियों में स्त्री कलाकारों को भी अवसर प्राप्त होने लगे और आज हमें गर्व है कि, राजस्थान की कई महिला कलाकार राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ठ पहचान बना चुकी हैं।
यदि आने वाले समय में इस तरह से उचित प्रोत्साहन मिलता रहा तो नि:संदेह राजस्थान की महिला कलाकार भी देश में अपनी अपनी अभिव्यक्ति द्वारा राजस्थान की कला धारा को समृद्ध करती रहेंगी। आयोजकों को बहुत बहुत बधाईयाँ और धन्यवाद। आशा करता हूँ कि जवाहर कला केन्द्र द्वारा इस तरह के शिविर भविष्य में भी लगातार आयोजित होते रहेंगे।
शिविर में चित्रण कर रही चित्रकार हेमल कांकरवाल से उनके चित्र के बारे में बात हुई तो हेमल ने बताया कि मेरे चित्र का शीर्षक "अस्तित्व" है, इस चित्र द्वारा मैने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि "स्त्री के आत्मबोध और उसके अपने अस्तित्व की खोज कर सकती है पर इसके लिए उसे स्वयं कदम उठाना होगा। पीछे दिखाई देती धुंधली आकृतियाँ समाज की उस भीड़ का प्रतीक हैं जिसमें व्यक्ति अक्सर अपनी पहचान खो देता है।
हाथ में पकड़ा हुआ फूल उस छोटे लेकिन साहसी कदम का संकेत है जब एक स्त्री अपनी खुशी और अपनी पहचान के लिए जीना शुरू करती है। यह चित्र बताता है कि भीड़ से अलग होकर अपनी राह चुनना ही स्त्री के सच्चे अस्तित्व की शुरुआत है।"
मीडिया प्रतिनिधियों, कला प्रेमियों, कला विद्यार्थियों और जयपुरवासियों को शिविर के दौरान निर्धारित समय में आकर कलाकारों से मिलने और उनके कार्यों को देखने के लिए भी आमंत्रित किया जाता है ताकि वे कला के वर्तमान परिदृश्य एवं भारतीय संस्कृति के कलात्मक रूप से परिचित हो सके।
संदीप सुमहेन्द्र





Thankyou so much sir.. for understanding my point of view🙏🏻💐
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा
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