महिला दिवस के अवसर पर जवाहर कला केन्द्र द्वारा "वसुधा" महिला चित्रकार शिविर 8 मार्च से अलंकार कला दीर्घा में शुभारंभ हो 13 मार्च को संपन्न हुआ।
इस शिविर में सभी आमंत्रित महिला चित्रकारों ने अपना चित्रण कार्य पूर्ण किया जिसकी प्रदर्शनी भी सुदर्शन कला दीर्घा में कला प्रेमियों के अवलोकनार्थ लगाई गई। जिसका उद्घाटन जवाहर कला केन्द्र की अतिरिक्त महानिदेशक, अनुराधा गोगिया द्वारा किया गया।
इस अवसर पर रचनात्मक संवाद करते हुए शिविर को महिलाओं के सशक्तिकरण को समर्पित किया गया है। यह प्रदर्शनी 29 मार्च तक कलाप्रेमियों के अवलोकनार्थ प्रातः 11 से सायं 6 बजे तक खुली रहेगी। इस कला शिविर को निखत अंसारी क्यूरेटर किया है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों से दस महिला कलाकार भाग ले रही हैं, जो कला की तीन पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
वरिष्ठ और प्रख्यात चित्रकारों में सुरजीत कौर चोयल, मीनाक्षी कासलीवाल भारती और केतकी रॉय चौधरी। मध्य पीढ़ी की चित्रकारों में: शकुंतला महावर, नीलू कांवरिया, हेमल कांकरवाल और करुणा सिंह राजपूत है, तथा युवा उभरती चित्रकारों में हैं: डिम्पल दलाल, एकता शर्मा और जयश्री सिंह देव को आमंत्रित किया गया है। जिससे यह शिविर विविध सांस्कृतिक और कलात्मक पृष्ठभूमियों का एक जीवंत संगम बन गया है। शिविर के दौरान आगंतुक कलाकारों एवं कला प्रेमियों को एक्रेलिक ऑन कैनवास, धागा कार्य, लोक कला परंपराएँ और समकालीन दृश्य कला जैसी विभिन्न माध्यमों और शैलियों में काम करते हुए देख सकेंगे। यह विविधता भारत में महिला कला के विकसित होते परिदृश्य को सार्थक रूप से दर्शाती है।
“वसुधा – महिला कलाकार शिविर” केवल कला का उत्सव ही नहीं है, बल्कि कला के माध्यम से महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल भी है। निसंदेह जवाहर कला केन्द्र द्वारा की गई इस पहल का उद्देश्य महिला चित्रकारों के रचनात्मक सहयोग को बढ़ावा देना, विभिन्न पीढ़ियों के बीच मार्गदर्शन की परंपरा को मजबूत करना और महिलाओं को अधिक दृश्यता प्रदान करना है। केन्द्र की इस पहल से महिला चित्रकारों को इस क्षेत्र में मजबूत करने का संदेश भी है कि कला सामाजिक अभिव्यक्ति और सशक्तिकरण का एक प्रभावशाली माध्यम हो सकती है।
इस शिविर में सर्वप्रथम मेरी चर्चा हुई उदयपुर की वरिष्ठ चित्रकार सुरजीत कौर चोयल जी से उन्होंने बताया कि "मैं आरम्भ से ही पश्चिमी चित्र शैली के प्राकृतिक यथार्थवादी चित्रण से प्रभावित रही हूं। और, अपनी कला शिक्षा के दौरान धीरे-धीरे कई तरह के फोटोग्राफ से अपनी चित्राभिव्यक्ति करने लगी थी। काफी समय तक मैंने समाज की कुरीतियों, भारतीय स्त्रियों की कुण्ठाओं आदि के प्रति सामाजिक तिरस्कार को अपनी चित्राभिव्यक्ति दी।
कुछ समय से मुझे राजाओं राजनेताओं व राव-उमरावों के 19वीं व 20वीं सदी के सिपिया रंगों के फोटोग्राफ ने विशेष प्रभावित कर रखा है। जैसे सारे लोगों की धनराशि व टैक्स लगाकर अमीरों व प्रशासकों ने अपने आपको सजा रखा हो। साथ ही उस अकड़ के साथ अपना फोटो या चित्र बनवाना कि उनसे श्रेष्ठ संसार में कोई नहीं।
सुरजीत जी द्वारा रचित चित्रों में फोटोग्राफी की सीपिया तकनीक को बहुत ही प्रभावी तरीके से चित्रित करती है, जिन्हें देखकर लगता है जैसे ये वाकई में सीपिया टोन के फोटोग्राफ्स हो।
कोलकता से आई चित्रकार केतकी रॉय चौधरी के चित्र का शीर्षक का विषय "महाप्रकृति" है। केतकी ने बताया कि इंसान प्रकृति के बिना जिन्दा नहीं रह सकता, वे दोनों बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं। मुख्य रूप से महिला, जिनमें जीवन की गहरी जड़ें विद्यमान है। मेरा मानना है कि जिस प्रकार हमारा जीवन प्रकृति पर निर्भर है, उसी प्रकार हमें भी अपनी प्रकृति से जुड़े रहना चाहिए और उसके संरक्षण के लिए तथा संभव प्रयत्न कर सहयोग करना चाहिए।
जयपुर की वरिष्ठ चित्रकार
मीनाक्षी कासलीवाल भारती ने "पंच तत्वों" पर आधारित अपने चित्र के बारे में बताया कि जिस प्रकार "पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और आकाश ऐसे तत्व है, जिनमें सब कुछ समाया हुआ है, यही जीवन के मुख्य आधार है। इसलिए इनको चित्रों में बहुत तरह से चित्रित किया जा सकता है। मैंने अपनी पेटिंग में आकाश को इंद्रधनुषी रंगों में दिखाया है।
फिर चित्रकार शकुंतला महावर से चर्चा हुई तो उन्होंने बताया कि मेरे चित्र का शीर्षक "पारंपरिक नारी-सौंदर्य का कलात्मक रूपांकन" चित्रित किया। चित्र के विषय शकुंतला ने बताया की "मेरे चित्र में भारतीय पारंपरिक कला शैली और स्त्री-सौंदर्य के सौम्य तथा सजीव रूप का प्रभावशाली चित्रण किया है। इस कृति में एक अलंकृत भारतीय नारी को दर्शाया है, जो पारंपरिक वेशभूषा और आभूषणों से सुसज्जित होकर अपना श्रृंगार करती हुई दिखाई देती है। यह दृश्य भारतीय संस्कृति में नारी के सौंदर्य, सौम्यता और शालीनता के प्रतीकात्मक रूप को अभिव्यक्त करता है।
मेरे चित्र में प्रयुक्त सूक्ष्म रेखांकन मेरी कलाकृति की प्रमुख विशेषता है। सफेद रंग की बारीक रेखाओं से मैंने आभूषणों, वस्त्रों तथा सजावटी अलंकरणों को अत्यंत बारीकी से उकेरने का प्रयास किया है। रेखाओं की लयात्मकता चित्र को एक विशिष्ट सौंदर्यात्मक आकर्षण प्रदान करती है। पृष्ठभूमि में भूरे और काले रंगों का संयोजन तथा मुख्य आकृति में हरे रंग का प्रयोग चित्र को संतुलित और प्रभावशाली बनाता है।
चित्र के ऊपरी भाग में रेखांकित अलंकरण और सजावटी रूपांकन भारतीय पारंपरिक स्थापत्य और लोक-शैली की स्मृति को जागृत करते हैं। वहीं नारी की मुद्रा, उसके वस्त्रों की लयात्मक रेखाएँ और आभूषणों की सजावट भारतीय लघुचित्र एवं लोकचित्र परंपरा की सौंदर्य दृष्टि से प्रेरित प्रतीत होती हैं।
यह कृति केवल एक दृश्य चित्रण नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति में निहित नारी की सौंदर्य चेतना, श्रृंगार-परंपरा और कलात्मक संवेदनशीलता का भी प्रतीक है। मैंने पारंपरिक विषय-वस्तु को आधुनिक रंग-संयोजन और रेखांकन के माध्यम से प्रस्तुत कर एक संतुलित और आकर्षक दृश्य रचना निर्मित की है। समग्र रूप से यह चित्र भारतीय लोक एवं पारंपरिक कला की समृद्ध परंपरा को समकालीन अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत करता है और दर्शकों को भारतीय सांस्कृतिक सौंदर्य-बोध से परिचित कराता है।
चित्रकार
नीलू कांवरिया ने बताया कि मेरे चित्र में आधुनिक स्त्री के उस अंतर्द्वंद्व को चित्रित किया है, जिसमें वह आज भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है। समाज, परिवार और परंपराओं की अदृश्य बेड़ियाँ उसे रोकती हैं, फिर भी वह टूटती नहीं बल्कि अपने भीतर से ऊर्जा और आशा खोज लेती है। मैने अपनी कलाकृति में स्त्री जीवन के अनेक अनुभवों, भावनाओं और संघर्षों को प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त करने का प्रयास किया है। कैनवास पर बने असंख्य छोटे-छोटे चेहरे उन अनगिनत स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो समाज और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अपनी पहचान और शक्ति को खोजती हैं।
वृत्ताकार संरचना जीवन के चक्र, सामूहिक चेतना और एकता का प्रतीक है। इसके केंद्र में उभरती ऊर्जा उस आंतरिक इच्छा शक्ति और आशा को दर्शाती है, जो हर स्त्री के भीतर विद्यमान है। मैंने अपनी कलाकृति में यह दर्शाने की कोशिश की है कि अनेक चुनौतियों और बंधनों के बावजूद स्त्री अपनी संस्कृति, आस्था और परंपराओं से जुड़कर जीवन में उत्साह, आशा और आगे बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त करने में पूर्ण रूप से सक्षम है।
युवा चित्रकार
जयश्री सिंह द्वारा निर्मित चित्र का शीर्षक "An Autumn Evening" है। जयश्री ने बताया की "मैंने अपने चित्र में मनुष्य और प्रकृति के बीच एक शांत संवाद के क्षण को व्यक्त किया है। मेरे चित्र में बैठी हुई स्त्री और उसके आसपास बिखरे लाल फूल आत्मचिंतन और आंतरिक शांति का संकेत देते हैं तथा गहरे सांध्य वातावरण में चमकते ये फूल शरद ऋतु की उस ऊर्जा का प्रतीक हैं, जहाँ खिलना और बिछड़ना दोनों साथ-साथ मौजूद होते हैं।
यह दृश्य प्रकृति को एक मौन गुरु के रूप में प्रस्तुत करता है, जो हमें आशा, प्रकाश और सकारात्मकता का संदेश देती है, जो जीवन को गरिमा के साथ जीने, परिवर्तन को स्वीकार करने और हर परिस्थिति में गर्व के साथ खिलते रहने की कला को दर्शाता है।
इस बहुउद्देशीय कला शिविर में तीन पीढ़ियों की चित्रकारों को अपनी अपनी शैली में चित्रण करते हुए देखना और उनसे चित्र के विषयों पर बात करना मेरे लिए बहुत सुखद अनुभव रहा। ऐसे सार्थक चित्रण शिविरों का आयोजन जवाहर कला केन्द्र द्वारा नियमित रूप से करवाया जाएं तो महिलाएं कला अभिव्यक्ति में मुख्य धारा से जुड़कर अपने आपको एक स्थापित चित्रकार के रूप में स्थापित कर सकेंगी।
कला प्रेमियों, विद्यार्थियों और जयपुरवासियों ने शिविर के दौरान निर्धारित समय में आकर कलाकारों से मिलने और उनके कार्यों को देख प्रसन्नता जाहिर की, क्योंकि सिर्फ चित्र देखने और चित्रकार को चित्रण करते हुए देखने का उनके मानस पर अलग प्रभाव पड़ता है। वे कला के वर्तमान परिदृश्य एवं भारतीय संस्कृति के कलात्मक रूप से और अधिक गहराई से परिचित होते है।
संदीप सुमहेन्द्र
Very nice 👌👍
ReplyDeleteWah sandeep ji bahut hi अद्भुत tarah se aapne kalakaro ke kaam ki vyakhya ki hai
ReplyDeleteBahut sunder lekhan k sath rachnatmak abhivyakti kerte kalakaro ko ek hi manch per sagha kerne k liye bahut bahut badhai 👏🙏
ReplyDeleteBringing everyone together under a single platform is an excellent achievement, and it is highly appreciable work.
ReplyDeleteअत्यंत सुंदर चित्र
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर आलेख
ReplyDeleteविस्तृत प्रभावशाली और सारगर्भित आलेख के लिए बहुत बहुत आभार 🙏🙏
ReplyDeleteनीलू कांवरिया
अदभुत अद्वितीय लाजवाब बधाईयां आप सभी को
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