साधना के आँगन में घुंघरुओं की स्वर लहरीयां, मेरे गुरुदेव गिरधारी जी महाराज के चरणों में कृतज्ञ नमन : डॉ. सोनिया शर्मा
जब भी जुलाई का महीना आता है, हवाओं में एक अलग सा संजीदापन घुल जाता है। कैलेंडर में "गुरु पूर्णिमा" की तारीख बाद में आती है, और हमारे ज़हन में गुरु जी की आवाज़, वो पढ़ंत की लय, नटराज की वो पुरानी इमारत और कक्षा की वो जानी-पहचानी खुशबू पहले गूंजने लगती है। आज हम सभी शिष्य मिलकर अपने उस सुनहरे दौर को याद कर रहे हैं, जहाँ हमने सिर्फ कथक नहीं सीखा, बल्कि जीवन जीना सीखा। घुंघरुओं को भाषा दी, पैरों को परवाज़ दी, खुरदरे उस फर्श को भी, मंदिर सी आवाज़ दी। डांट में भी छुपी थी जिसके, जीतने की एक तड़प, आज उस गुरु के चरणों में, शीश झुके सौ-सौ दफ़ा। नटराज का वो आँगन और मेरी पहली मुलाकात यह सफर तब शुरू हुआ था जब मैं एक संगीत संस्थान में नई-नई कथक सीख रही थी। मेरी कुछ सहपाठी लड़कियां गुरुजी के पास 'नटराज' जाया करती थीं। जब वे वहाँ से सीखकर आतीं, तो नटराज की बातें करतीं—"आज यह बंदिश सीखी, आज ऐसे रियाज़ किया।" उनका वो उत्साह और रियाज़ देखकर मेरा मन भी मचल उठता था कि काश! मैं भी गुरुजी के सानिध्य में सीख पाती। पर इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि किससे कहूँ, कैसे बात करूँ। फिर ...