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दर्द भरी दास्तां-चित्रकार वोनगोग : चेतन औदिच्य

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वह हॉलैंड के ज्युंडर्ट गांव में जन्मा था। मगर पूरी दुनिया, उसकी अपनी थी। दुनिया ही क्यों? सारा आकाश और तारामंडल भी उसका अपना था। रेंब्रांट, कोरो और मिले के चित्र उसके अपने थे। ब्रबंट के खान मजदूरों की घास के पुआल वाली कोठारिया उसकी अपनी थी। सड़कें, गलियां, नदियां, खेत और जलपान-ग्रह, सभी कुछ उसका अपना था। उसके दिलो-दिमाग की ज़द में बाहर की दुनिया तो थी ही। भीतर का अंतरिक्ष भी उसका अपना था। सारी समष्टि ही उसकी थी। मगर अफसोस कि समष्टि का वह नहीं था। इस सर्वथा अस्वीकृत मनुष्य का जन्म लेना धरती पर एक दुर्घटना थी महज़।  विंसेंट वोनगोग को आज पूरा विश्व एक महान चित्रकार के रूप में जानता है। ना केवल जानता है, अपितु उसकी कृतियों के साथ, उसके कष्टमय जीवन से अनन्य प्रेम करता है। उसी वोनगोग से, जिसके चित्रों को उसके जीवित रहते कभी महत्व नहीं मिला। ना ही उसे वह प्रेम प्राप्त हुआ जिसके लिए वह मृत्यु पर्यंत बेचैन रहा। वोनगोग के सृजन की बेचैनी आत्यंतिक-उत्कट थी। वह मानवता के उस कारुण्य का सागर थी, जिसे उसके 'समय' ने नहीं समझा। पग-पग पर मिली निराशा और तिरस्कार ने उसके मन मस्तिष्क को छिन्न-भिन्न ...

वरिष्ठ चित्रकार नरेंद्र सिंह चौहान-राजस्थान के अदभुद कला साधक : संदीप सुमहेन्द्र

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स्मृति_शेष : चित्रकार नरेंद्र सिंह चौहान                     जन्म - 8 जनवरी 1932                    देवलोकगमन - 17 जनवरी 2020   जयपुर । पोर्ट्रेट और यथार्थवादी चित्रकला के सिद्धहस्त चित्रकार श्री नरेन्द्र सिंह चौहान जी की आज पुण्यतिथि है, राजस्थान के वरिष्ठ और श्रेष्ठ चित्रकार को कलावृत्त परिवार की और से सादर नमन करते हुए मैं विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। चित्रकार की कला में लावण्यता और पश्चिम में इटली और यूनानी की कला शैली तथा मूर्तिकला के शरीर सौष्ठव से विशेष रूप से प्रभावित है। इसी कारण उनके चित्र एवं मूर्तियां भी और अधिक आकर्षक और सुंदरता लिए होती है। बंगाल की वाश शैली का प्रभाव भी सुस्पष्ट इनके चित्रों पर दिखता है। मेवाड़ के कोठारिया वंश से जुड़े एवं आजाद हिंद फौज के सैनानी श्री धवलसिंह चौहान के सुपुत्र चित्रकार नरेंद्र सिंह चौहान दर्शनशास्त्र के मर्मज्ञ चित्रकार है किंतु कला के क्षेत्र म...

यादों के झरोखों से - कला गुरू श्री सी.बी. बरतारिया : डाॅ. प्रेमकुमारी मिश्रा ‘रश्मि’

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शिक्षा-जगत से जुड़ी अपनी जीवन कहानी के पन्नों पर लिखी वे सभी यादें पुनः आँखों के सामने तैरने लगी जब अखिलेश निगम जी का अनुरोध श्री छैल बिहारी बरतारिया के सम्बन्ध में लेख लिखने को कहा गया-अचानक वे सभी यादें स्मरण हो आयीं जब मैं शिक्षा जगत में विचरण कर रही थी। सन् 1964 में मेरा दिल्ली से कानपुर आना हुआ और हिन्दी, संस्कृत साहित्य के साथ-साथ कला में रूचि होने के कारण साहित्य, संगीत और कला की कानपुर की गतिविधियों में भी अपने पिता के साथ अनेक कार्यक्रमों में जाती रहती थीं। चित्रकला के सन्दर्भ में पं. सिद्धेश्वर अवस्थी जो ललित कलाओं के मर्मज्ञ थे उनसे ज्ञात हुआ कि कानपुर का साहित्य और संगीत अधिक मुखर है, हाँ चित्रकला सामन्ती एवं कुलीन समाज की माँग पर कानपुर के चित्रकार रामशंकर त्रिवेदी, प्रभुदयाल तथा रूप किशोर कपूर आदि ने पोट्रेट पेंटिंग का बहुत सा कार्य किया किन्तु मौलिक एवं भावाभिव्यक्ति से रहित उक्त रचनायें मात्र नकल पर आधारित होने के कारण चित्रकला की वास्तविक परिभाषा में शामिल नहीं हो सकी। हाँ कुछ चित्रकार श्री प्रभुदयाल कालीचरण तथा सिद्धेश्वर अवस्थी उस समय पर स्वतंत्रभाव से चित्रांकन कर रह...

'धर्मयुग' में सुमहेन्द्र : अखिलेश निगम

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      ' धर्मयुग '    साप्ताहिक में राजनीति , समसामयिक विषय , फिल्म के साथ-साथ साहित्य और ललित कलाओं पर भी काफी कुछ प्रकाशित होता रहता था। इसीलिए उसके विभिन्न क्षेत्रों के अच्छे-खासे पाठक हुआ करते थे , और उन्हें उसके अंक की प्रतीक्षा रहती थी। कला-क्षेत्र की विभिन्न विधाओं के चर्चित कलाकारों की किसी एक कृति के साथ उस कलाकार पर मित्र मनमोहन सरल जी की टिप्पणी भी प्रकाशित होती थी। इस श्रृंखला का प्रकाशन वर्ष 1973-74 से प्रारंभ हुआ था। प्रसंगवश बताता चलूं कि मनमोहन जी की कला और फिल्म समीक्षाएं चर्चित रही हैं। मुंबई में बस गये मनमोहन जी मूलत: उत्तर प्रदेश के ही निवासी हैं। उक्त चर्चित श्रृंखला में उस समय तेजी से उभर रहे जयपुर के कलाकार महेंद्र कुमार शर्मा को भी स्थान मिला था अर्थात ' सुमहेन्द्र ' को। यह वह समय था जब सुमहेन्द्र को राष्ट्रीय ललित कला अकादमी ' राष्ट्रीय पुरस्कार ' (1972) से सम्मानित कर चुकी थी , और वे मुंबई से अपनी एकल प्रदर्शन ( 1974) करके जयपुर वापस लौटे थे। प्रकाशित चित्र उनकी ' महाराणा प्रताप ' श्रंखला की एक कृति है , जिसमें प्रताप के...

सुमहेन्द्र और उनका रचना-संसार

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Dr. Sumahendra कला-गुरु डाॅ० महेन्द्र कुमार शर्मा "सुमहेन्द्र" (1943 - 2012) के 77वें जन्मोत्सव (2 नवम्बर) पर विशेष : सुमहेन्द्र और उनका रचना-संसार  Gods, Tempera, 1975 सुमहेन्द्र भारत के उन चंद कलाकारों में हैं जिन्होंने देश की परम्परागत कला-शैलियों को जीवन्त बनायें रखा है। उन्होंने परम्परा का निर्वाह करते हुए अपनी कृतियों में आधुनिक प्रयोग किये हैं, और उस सतह को तोड़ने के बावजूद परम्परागत शैली की विशेषताओं एवं प्रभाव को बरकरार रखा है। यूं तो कई परम्परागत कला शैलियों में सुमहेन्द्र ने दक्षता प्राप्त कर रखी थी परंतु मुख्यतः किशनगढ़ शैली में ही उन्होंने चित्रांकन किया, और अपनी कृतियों में अधिकांशतः इसी शैली के नायक-नायिका (बणींठणीं और नागरीदास) को प्रतीक स्वरूप समसामयिक समस्यओं से जूझते हुए या उनकी प्रेमकथा को आधुनिक प्रसंग में उतारा। Lady with pigion, Acrylic on bord उनकी रंग-संयोजना में अनोखा आकर्षण दिखता है, जिसने उनकी भावाभिव्यक्ति को और प्रखर बना दिया है। उनकी नेता, भेंट, लाशें, आधुनिक नारी तथा युवा आदि कृतियां आधुनिक समाज पर तीखा व्यंग्य करती हैं। लघु चित्रों की शास्त्री...

सुमहेन्द्र : भारतीय परंपरा का एक आधुनिक कलाकार

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  कला-गुरु डाॅ० महेन्द्र कुमार शर्मा "सुमहेन्द्र" (1943-2012) के 77 वें जन्मोत्सव (2 नवम्बर) पर विशेष : ♦ अखिलेश निगम   भारतीय आधुनिक कला के नाम पर जो आपा-धापी मची है, उसने कला के मापदंड में परिवर्तन किया है, इसे स्वीकारना ही होगा। ‘आधुनिक-कला’ संज्ञक आज की कला (अधिकतर) को समाज ने मान्यता दी है अथवा एक सीमित दायरे के कुछ व्यक्तियों को ही ‘समाज’ मानकर उनकी मान्यता को ही लक्ष्य की इतिश्री समझा जा रहा है, यह प्रश्न भी इसके साथ ही विचारणीय है। यह एक लम्बी बहस का मुद्दा है इसलिए फिर कभी, खैर… ऐसे वातावरण के मध्य जब लीक से हटकर हमें कुछ ‘नया’ देखने को मिलता है तब एक सुखद अनुभूति होती है। ऐसी ही अनुभूति राजस्थानी चित्रकार सुमहेन्द्र की कला कृतियों को देखकर मिलती है। ‘सुमहेन्द्र’ नाम से बहुचर्चित राजस्थान के प्रतिनिधि चित्रकार महेन्द्र कुमार शर्मा (जन्मः 1943) भारत के उन चंद कलाकारों में हैं जिन्होंने देश की परम्परागत कला-शैलियों को जीवन्त बनाये रखा। जयपुर में रसे-बसे सुमहेन्द्र पर आंचलिकता का प्रभाव प्रचुर मात्रा में पड़ा, यही कारण है कि राजस्थान की प्रख्यात किशनगढ़ शैली में...

प्रोफ़ेसर मदन लाल नगर स्मृति दिवस 27 अक्टूबर पर विशेष

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  दर्द छुपा था उनके चित्रों में चित्रकार मदन लाल नागर उत्तर प्रदेश के उन अग्रणी कलाकारों में रहे है , जिन्होंने समकालीन भारतीय चित्रकला में नये आयाम जोड़े हैं। यह उनकी लगन , संघर्ष और रचना-धार्मिता की कहानी भी अपने में समेटे है और अपने ' नगर ' की बिखरती प्राचीन संस्कृति का दर्द भी। इधर करीब दो दशकों से श्री नागर केवल ' नगर ' ( सिटी) शीर्षक से अपने शहर के विभिन्न रूपों को अपने चित्र-फलक पर उतारते रहे थे। उनका यह ' शहर ' कोई और नही वही तहजीब का जाना-माना ' लखनऊ ' था - जहां वे जन्में ( 1923), पले कला की शिक्षा पाई और दी भी। उनके जेहन से इन शहरों की वे गालियां , जिनमें उनका बचपन बीता। जिसे उन्होंने अपने कदमों से नापा और मकान की छत पर चढ़ कर देखा भी था , बिसर ना सका था। सुबह , दोपहर , शाम और न जाने कितने रूपों में देखा था उसे उन्होंने , और यह उनके चित्रों में मुखर होता रहा था एक ' मिथक ' की तरह। पर साथ ही उनमें एक दर्द भी था - ' लखनऊवीं तहजीब से कहीं बहुत गहरा लगाव था। ' देहरी का मोह ' भी शायद ऐसा ही होता है। उसके बदलते रूप को उनका ' कला...